सुनानी किसको है साहब,
अपनी इस बेसुरी आवाज़ को,
बस मन है की,
इस दिल में छुपे अँधेरे
को आवाज़ दूँ...
किसी मंजिल के
लिए नहीं,
हर दिन चलने की चाहत से करते हैं ...
किसी मतलब के लिए
नहीं,
संगीत तोह हम मोहब्बत के लिए करते हैं ...
सुनानी किसको है साहब,
अपनी इस बेसुरी आवाज़ को,
बस मन है की,
इस दिल में छुपे अँधेरे
को आवाज़ दूँ...
किसी मंजिल के
लिए नहीं,
हर दिन चलने की चाहत से करते हैं ...
किसी मतलब के लिए
नहीं,
संगीत तोह हम मोहब्बत के लिए करते हैं ...