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Sunday, October 6, 2024

Oh Baby My!

When life gives you a choice,
Betwixt licking your wounds 
& Prepping for the fight,
Oh baby my! Give the healing to time,
To the next adventure you dance along!

When life gives you a choice,
Betwixt hating the fools,
& Letting the garbage go by,
Oh baby my! Bid the hate good bye,
To the next adventure you dance along!

When life gives you a choice,
Betwixt a thick dark frown
& A big fat smile,
Oh baby my! Don't think before you laugh,
To the next adventure you dance along!

When you feel that only one way lies,
That life wants you to feel low & dry,
Oh baby my! Trust these words of mine,
A choice hides close by, 
To dance as life's adventure carries on!




PS- A random scribble at the airport as I return to Raipur after seeing Niyati and our week-old Zen.

Saturday, August 24, 2024

मुर्दों का बाजार

सत्य के थे पैर चार,
किया उनपे हमने ही वार,
गंदगी भोग कर जो,
सजा दिए झूठ के बाजार। 

अब आया झूठों का उबाल,
फैला निर्दयी खेलों का जाल,
सीधी साधी जिंदगी बनी जो,
रण जहां खुद ही से हो टकरार।
  
यहाँ सब संभव पर सब उचित नहीं,
जो लगे सही हो वो सहज नहीं,
इस नकली बसंत में सुंदर फूल दो,
छोड़ इन्हें, ये मौसम हैं बेकार।

कुछ सच्चे जन को तू परख, 
क्षण भर का जीवन, जी बेझिझक, 
मत भूल कि है तुझे सत्य से प्यार, 
ये शमशान सही, तू तो जिंदा है ना यार?





Friday, August 9, 2024

करना क्या है

How will you live if you know, as a fact, that your deceased parent is with you every moment, cheering for you to be the best version of yourself? 

As for me, I would want to make her proud and show her all that I can be. Living intensely, leaving no stones unturned and freeing myself from my past into a glorious future. I would live a life rich enough so as to be alive for millions of years, through the lives I touch. Exactly like my mom, who left her body on Saturday, the 24th of Februrary. I left at 5AM to catch the flight to meet her. I ended up scribbling this while I was driving home from the airport, where I had received the news of her demise. "Karna Kya hai" - The question I was asking at the moment, was as relevant to the social ceremonies involved as to the entire life I was living. 


घर आने को है, बहुत रो लिए, अब करना क्या है? 

जवाब इसका हमेशा मम्मी ने दिया है,

अब करना क्या है? 

घर पहुँचा आज जब, ना मिले जवाब तब, 

करना क्या है! बताओ ना मम्मी?   


आसुओं के प्रपात संग,उजड़ी सांस, सिसकि भंग,

दौड़-ता सवाल मन में, 

भेदता उपाय सब ये,

पूछे हर बीते क्षण, 

कि करना क्या है? 


अर्रे तू चीखता क्या है? कर ना वही, जो वो करतीं,

पूछ खुद से, तुझ ही में वो आ बसीं,

तो क्या है जी के करना - 

इस खौफनाक गणित में दिमाग मत लगा,

उनको जिंदा रखने को अभी तुझे है जीना। 


जो वक्त है ये मुश्किल,

तुझे रखना होगा बड़ा दिल,

धो के चेहरा, जा के सब से मिल,

हिम्मत दे सभी को, और दे भी ये तू भरोसा,

करा दे महसूस की अभी भी जिंदा है सरिता। 


Wednesday, July 24, 2024

स्याही

1.

मैं पूछूँ खुद से -

जिंदगी में अब क्या करूँ? 

चढ़ तो गया हूँ ऊपर बहुत,

इस अहम के नशे से और क्या लूँ ? 

2. 

आता कोई जवाब, उससे पहले 

चेहरे पे एक मुस्कान आ गयी,

विचार की जगह,

हाथ में कलम दे गयी ...

3. 

कभी सत्ता, कभी शौहरत,

और कभी अपनों से खेलने में कसर न है मैंने छोड़ी,

अब घर बैठ, कलम घिस,

परिवार में रहने का मन है बस यूँ ही ... 

 4.

थोडा आलस है, थोडा डर भी,

थोड़ी परेशानियां, थोड़े बहाने,

कुछ छोड़ना है, कुछ पकड़ना,

कुछ कम करना है, कुछ ज्यादा ...

5. 

इस नाप-तोल को तो है चलते रहना,

क्यूंकि परेशानी चाहे जितनी हो बड़ी,

है तो जन्मी वो मुझसे ही,

मुझसे बड़ी तो वो हो नहीं सकती ...

6.

क्या तू पूछता और क्या है कहता,

बना इस अहम के धुंए का शीशा,

अपने फैलाव को समेट,

और शीशे कि स्याही बन रचता जा ...



तू देखता जा!

मेरी हार को मेरी पहचान मत बना - 

मैं जीतूँगा, बस तू देखता जा !


जंग जब खुद की खुद से हो,

थोडा वक़्त जरूर लगेगा,

अच्छे से समझने को - 


क्यूंकि है जंग नहीं पर प्रेम मिलाप ये,

जिसमें जीवन की संभावनाएं खुद के अतीत से मिलें,

मिलन ये ऐसा की इसी में कई कहानियां गढ़ें-


है नायक या खलनायक, इसकी मत कर तू चिंता,

क्यूंकि क्या हार है क्या जीत, ये तो समय ही बताएगा,

अभी इन कहानियों का अंत न हुआ - 


इसीलिए, मेरी हार को मेरी पहचान मत बना,

मैं जीतूँगा, 

बस, तू देखता जा -


Saturday, July 20, 2024

नटखट मस्तियाँ

जिस्म की चुस्कियां, मन की अठखेलियाँ,

अजब है तेरा,

क्षणिक आकर्षण को समर्पण,

हो तू नंगा, पर छोड़ मत  दर्पण ...

क्या है सही, क्या गलत,

ये तुझे ही है समझना,

जंगल है, यहाँ मार्ग कई,

पर ना है कोई अपना ...

जब जीवन लागे नीरस,

छाँव में दोस्तों संग जा हंस,

इस हंसी का सुख है अपना,

पर भूल से इसे परमानंद ना समझ ...  

Saturday, March 9, 2024

कथा


तू पूछे -

और अब क्या बचा है?

लगता सब कुछ झोंक दिया है,

पर नये किरदार और मोड ये क्या हैं?

अभी कितना और चलना है?

 

ऐ बालक -

यह बड़ी बेहुदा व्यथा है,

पर इसी में जीवन छुपा है,

जब ये सवाल आता है,

तो समझ कुछ अभी भी बचा है।

 

तेरी मोह और आदतों के घेरों में,

अंधेरे कोनों में,

थोड़ा डर अभी भी पनप रहा है,

तेरा जीवन ही तो कथा है,

अब इसे भी झोंकना है। 

Monday, February 26, 2024

दोहरा सच

तेरा सच अलग है, 
मेरा अलग। 
तेरी शिकायत मुझसे है, 
मेरी शिकवा उससे है। 

तू सोचे, कुछ तेरे हिसाब से है नहीं,
मैं मानू जाल में फसा मैं भी यहीं। 
तू सोचे तेरे साथ हो रहा है गलत,
मानूं गलती से ही रगड़ा जा रहा हूँ मैं भी। 

तुझे दुख व्यक्त करने में रस है,
दुख भगाने की कोशिश मेरी चरस है। 
तेरे इरादे तो हैं बिल्कुल सही,
मेरे सही इरादों से हासिल हो कुछ नहीं|

तेरे मन के राक्षस करे तुझे परेशान,
मेरा मन मुझे ही बना देता है हैवान।
तू सोचे तुझे समझ सके कोई नहीं,
मैं सोचूँ मैं समझूँ तुझे पर तू मुझे नहीं।

क्या गलत, क्या सही, 
यह तो पता नहीं,
कब तक चलेगा सब, 
यह भी तो पता नहीं|

तेरा सच अलग है, 
मेरा अलग। 
शायद मंजिल भी हमारी अलग हों,
पर चलना तो है साथ ही| 

क्यूंकि हमारी मंजिलों से पहले,
ना ये रास्ता खत्म होगा, ना ये जिंदगी।
तेरा सच अलग है, 
मेरा अलग।
 
इन दोहरी सच्चाइयों की हैवानियत से,
हमें अब डरना है नहीं,
आखिर उसी की कृपा से हम हैं, 
और है नहीं वो निर्दयी...

Tuesday, October 3, 2023

बदलाव, और दोस्त?

I

तुम परदेस निकल गए -

पर हम तो देसी रह गए। 

चप्पल पहने, फ़ाइलें घिसते - 

तुम सूट-बूट में एप्पल टकटकाते।

बेरंग इनोवा में सिमटे सफर मेरे - 

तुम लेटेस्ट सेडान चलाते। 

जंगल के रास्ते, झरने हम खोजते - 

तुम बिजनस क्लास से हवाई जाते। 


II

पहले ऑर्कुट और फिर एफबी के जरिए - 

दुआ सलाम हो जाते थे। 

अब तो व्हाट्सएप ग्रुप पर भी - 

सिर्फ दुनियादारी के पैगाम ही हैं आते। 

इंस्टा से कभी-कभी - 

तुम्हारे समाचार मिलते रहते थे। 

पर जमीन पे बैठ, कश मार के,

बिखरने के मौके कभी नहीं मिलते। 


III

आस हुई, की आज तुम्हें फोन लगा ही लें - 

कैसे भी तुम्हें सलाम फरमा लें,

टूटी फूटी अंग्रेजी अपनी, परदेस वाला ऐक्सेन्ट भले ना हो इसमें,

सोचा जरा हिन्दी मिक्स कर के काम चल ही लेंगे, 

याद दिलाया खुद को, कि ज्यादा मज़ाक नहीं उड़ाना है,

कालेपन पे हसने को, रेसिस्ट कहता ये जमाना है। 

छिछोरापन भी ज्यादा नहीं करना है, 

अब इज्जतदार आदमी हमारा चंदनवा है। 


IV

फिर लगा ही लिया तुम्हें फोन हमने, 

झटपट उठा भी लिया उधर तुमने। 

जैसे की तुम भी इंतज़ार में ही बैठे थे,

इतनी इज्जत से किया तुमने सलाम, लगा की ऐठे थे। 

हिचक थी हममें, और थोड़ी तुम में भी,

ना रिश्तेदार, ना किसी अंग से संबंधित गाली दी।

शराफत से पूछ लिया पारिवारिक स्थिति का हाल,

अच्छे से बात हुए, हो भी गए थे दस साल। 


V

इतने में बात हो गई कॉलेज की चालू,

और उठ गई कहानी जिसकी किरदार थी शालू।  

उसका नाम सुन तुम विडिओ पे ऐसे शरमाए,

जैसे काले आसमान पे गुलाबी बादल छाए। 

पुकार ही दिया फिर हमने,

तुम्हें उस रेसिस्ट नाम से। 

गूंज गया व्हाट्सएप का सर्वर,

गालियों की धड़ाम से। 

याद आ गई लड़कपन की मस्ती,

धीरे से हमारी बातें हुई सस्ती। 

रखने का मन तो नहीं था किसी का,

पर ऑफिस कि कॉल थी उसकी।  


VI

समय और जगह से परे,

यह कैसा संबंध है? 

इसमें जो घुल गया है हमारे, 

असली चरित्र का रंग है। 


VII

पार किया था साथ हमने, 

जवानी का हर एक चौराहा। 

दूरी चाहे जितनी हो जाए, 

दूरी, चाहे जितनी हो जाए - 

आज भी एक दूजे के लिए,

दिल में उतनी ही है जगह। 

Friday, September 29, 2023

क्या मायने?

तू है कहीं।

मैं हूँ कहीं।

हमें तो बस है जोड़ती,

हवस मर मिटने की।

 

शब्द मेरे, या विचार तेरे,

क्या मायने?

प्रश्न तेरे, या उत्तर मेरे,

क्या मायने?

डर तेरे, या सपने मेरे,

क्या मायने?

 

क्या मायने की अलग है अपनी जिंदगी?

जब तू भी यहीं।

और मैं भी यहीं। 


PS: We keep looking for friendships, often unseeing the people around. 

Tuesday, June 20, 2023

चिंता मत कर

सब अच्छा होगा,
उनके लिए जो हो अच्छा, वही होगा,
चिंता मत कर, सब अच्छा होगा ।।   
 
तेरी नकली खुशी, दबे हुए आसुओं से कुछ ना होगा,
जो वो तय करेगा, वही तो होगा,
चिंता मत कर, सब अच्छा होगा ।।  
 
इन कमजोर उम्मीदों, अधमरी हारों से भी कुछ ना होगा,
तेरी कोशिशों से नहीं, उसके इशारों से ही समय चलेगा,
चिंता मत कर, सब अच्छा होगा ।।  
 
चाहे हो जीना या उसमें विलीन हो जाना,
क्या है बेहतर, वोह निर्णय करेगा,
चिंता मत कर, सब अच्छा होगा ।।  
 
जो होना होगा वही तो होगा
देखना बस है, कि तू कितना समझ सकेगा,
चिंता मत कर, सब अच्छा होगा ।। 

समझ रहा है ना?
उनके लिए जो हो अच्छा, वही होगा,
अब तू चिंता मत कर, सब अच्छा ही होगा ।।  
 


PS: Dedicated to all the caregivers out there. Everything is as per his plan. Acceptance is a choice.




Wednesday, April 19, 2023

Mumma

That innocently naughty smile of yours.

When the Child within you, smiles at us all.

Peering through the clouds of despair,

Ignoring the pain and soaring in the air.

 

The baldness adds to the glow of your sweet presence. All your goodness flows like warm chocolate into that uber cute face of yours...

The eyes that look straight at me, as if seeing through me. The eyebrows that move in a friendly way - as if sharing an intimately naughty secret with their son. I pull your cheeks tenderly, like that of a child. I have felt like one around you in my life so far. It's only apt that you are allowed to do the same today. In your moments of un-ease, when a stroke of fate has exhumed a few memories foul. Never mind your recollection's partial loss, it can be pacifying at times. You're here with me for a long time. I know it in my bones. And you will be happy, peaceful, and joyfully naughty. Like you truly are. Love you. My Mumma.

  

Thursday, February 2, 2023

Sweet Child of Mine

Initial hesitation in writing is natural. The mental image is perfect, expectations are high, and the world is watching. So that when the pen is held, the heavy baggage of expectation drags it down. This expectation is the self-imposed friction that wears off the pregnancy of the mind. So much so that the idea becomes an unborn child, cursed to death. 

This is the time to take a step back. Feel the child within, allow him to take his own shape. Let him feed off you and Your Truth. He will come out in the world at the apt time. When he does step out of its embryonic cocoon to lie in your lap, nurture him with the knowledge that he is perfect. Enjoy the time that you get to spend with him. Very soon he will outgrow your desk, to step out in the world. And then you will miss him. So, cuddle him and play with him, utterly devoted to this divine opportunity to grow along with this sweet child of yours. 

Writers' राम-बाण

 

तू कर लेगा - 

मत गिनवा गलतियाँ अपनी,

ना किसी काम के तेरे बहाने,

छोड़ यह सपने डरावने, 

क्योंकि तुझे भी ये पता है की, 

तू कर लेगा। 


कल फिर शुरू करेगा,

उठेगा, झाड़ेगा, हसेगा 

खुद कि सच्चाई को गले लगाएगा,

और फिर चल पड़ेगा। 

क्योंकि तुझे  ये पता है की, 

तू कर लेगा। 


भाईसाहब तू तो लिखेगा,

बारिश हो या नहीं, शब्दों की बाल्टी भरेगा, 

ठोकेगा पत्थरों के मूँह को,

जब तक चट्टान से पानी नहीं बहेगा। 

क्योंकि तुझे  ये पता है की, 

तू कर लेगा। 



Colon D

Sometimes in moments of strong emotion, one can do nothing but smile. At the situation. At everything outside. At everything within. A smile to himself. I call the smile, my Colon D face. An attempt to sketch it for myself - 


That colon D re-appears on this mask,

Pierces it to reflect the real truth - 

Of The calm surface beyond all the turmoil.


Sharp pains and deep excitements below,

Torrent of psychological, emotional waves - 

Engulfing all this and more, while hiding nothing -

This colon D says it all...

  

महाकाल

जब लिखने से भागता हूँ तो संगीत पनह देता है,

और जब संगीत में बेहता हूँ तो लिखा हुआ दिशा देता है । 

इन्हीं सुरीले शब्दों पर कुछ लिखने की कोशिश - 


सुरों से जुड़े हैं शब्दों के तार,

डूबें जितना खुद में, उतना ही आता उस पर प्यार,

है उस प्यार के ही ये पैगाम सब,

किताबों और कहानियों के बने किरदार हम। 


कोशिश है हमारी की ज़ाया ना जाए,

इस विचार का हर अंश काम आए,

बुनते रहते हैं इन विचारों के जाल को,

कमबख्त, किसको पड़ी दुनिया की,

जब खुद में महाकाल हो । । ।    

Friday, November 25, 2022

किशमिश

समय के थपेड़ों में उलझी,

तन पे सजाए, निशान ये, सितम के - 

इस विशाल दुनिया में हो तुम छोटी सी,

अपनी भोली सी, थकान भरी, मुस्कान लिए - 

सूखे से कवच में खुद को लपेटी,

अंदर बैठी हो गुपचुप, मन में, मिठास भरे - 

रिश्तों के पकवान में हो समा जाती,

हर सलवट में, सहज, प्रेम भरे। 


अदबुद्ध हो, अदबुद्ध हो तुम सचमुच, मेरी किशमिश । ।     

तर्क का गहना

इस दिल की बनावट है हीरे सी, 

हर चेहरे में दिखता इसके - जीवन बहुरंगी । 

माला-सी ये नन्ही कविता मेरी,

इन भावनात्मक रंगों को - अपने शब्दों से पिरोती । 


पहनाती उनपे मेरे तर्क का गहना, 

और संगवारी से कर देती है बयां । 


यह कविताएं ही तो हैं - 

ये ही तो दे देती है - इस दिल को पनाह।  

जाने कब मैं इन शब्दों को पिरोने के काबिल बना !

जरा सोचो - यह काबिलियत ही तो है इंसान होना ।। 

कल से फिर

1.

कल फिर से,

इस दिन में,

सूरज ढलेगा।


कल फिर से,

इस घर में,

रोशनी बुझेगी।


कल फिर से,

इस दिल में सवाल उठेगा, 

फिर झूठी फ़िराक जगेगी।।


2. 

कल से फिर,

इस कमरे में,

एक फूल खिलेगा।


कल से फिर,

इस धरती पे, 

वो सूरज उगेगा।


कल से फिर,

ज़हन में चिराग जलेगा।  

और फिर, समर्पण की आग लगेगी ।।


Monday, April 11, 2022

अँधेरे की आवाज़

सुनानी किसको है साहब,

अपनी इस बेसुरी आवाज़ को,

बस मन है की,


इस दिल में छुपे अँधेरे को आवाज़ दूँ...

 

किसी मंजिल के लिए नहीं,

हर दिन चलने की चाहत से करते हैं ...


किसी मतलब के लिए नहीं,

संगीत तोह हम मोहब्बत के लिए करते हैं ...




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