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Friday, August 9, 2024

करना क्या है

How will you live if you know, as a fact, that your deceased parent is with you every moment, cheering for you to be the best version of yourself? 

As for me, I would want to make her proud and show her all that I can be. Living intensely, leaving no stones unturned and freeing myself from my past into a glorious future. I would live a life rich enough so as to be alive for millions of years, through the lives I touch. Exactly like my mom, who left her body on Saturday, the 24th of Februrary. I left at 5AM to catch the flight to meet her. I ended up scribbling this while I was driving home from the airport, where I had received the news of her demise. "Karna Kya hai" - The question I was asking at the moment, was as relevant to the social ceremonies involved as to the entire life I was living. 


घर आने को है, बहुत रो लिए, अब करना क्या है? 

जवाब इसका हमेशा मम्मी ने दिया है,

अब करना क्या है? 

घर पहुँचा आज जब, ना मिले जवाब तब, 

करना क्या है! बताओ ना मम्मी?   


आसुओं के प्रपात संग,उजड़ी सांस, सिसकि भंग,

दौड़-ता सवाल मन में, 

भेदता उपाय सब ये,

पूछे हर बीते क्षण, 

कि करना क्या है? 


अर्रे तू चीखता क्या है? कर ना वही, जो वो करतीं,

पूछ खुद से, तुझ ही में वो आ बसीं,

तो क्या है जी के करना - 

इस खौफनाक गणित में दिमाग मत लगा,

उनको जिंदा रखने को अभी तुझे है जीना। 


जो वक्त है ये मुश्किल,

तुझे रखना होगा बड़ा दिल,

धो के चेहरा, जा के सब से मिल,

हिम्मत दे सभी को, और दे भी ये तू भरोसा,

करा दे महसूस की अभी भी जिंदा है सरिता। 


Thursday, July 25, 2024

नए पंख

 1.

माँ, ये क्या मुझे है हो रहा?

चलते हुए खो गया मैं रस्ता यहाँ - 

अब न राह दिखती, न है कोई सहारा, 

दिमागी बोझ से है कंधा झुक सा गया ...

2.

बेटा, ये क्या है तू कह रहा? 

गौर से तो देख तू जरा - 

डरावना भले, पर सुन्दर है तेरा जीवन सजा,

जमीन तो क्या, अब पूरा आसमान है तेरा ...


नया जरूर तू इन हवाओं में अभी,

सीखेगा इन्हें, भले नए हों नियम सभी,

तो खोज मत तू चलने का कोई नया सहारा,

उठा पंख, बोझ ये तेरे नए पंखो का ...


जब मिल सकता है तू रोज़ मुझसे बादलों के बीच,

उंचाई से डर के अपनी आँख न भींच,

चलने या दौड़ने का नहीं, समय है ये उड़ने का,

बहुत किया संघर्ष अब मस्त हो के पंख फैला ...  

 

Wednesday, July 24, 2024

बघिया मेरी













1.

ये कहानी है

एक सुंदर सी बघिया की, 

और चंद नन्हे से फूलों की,

पर था इसमें एक पेड़ भी ...

2.

बीते बचपन-जवानी फूलों के,

बघिया की गोद में खिलखिलाते,

एक पेड़ की छाया में पलते,

हँसते हुए, गीत उसके गाते ... 

3. 

वो फूल तो थे बघिया के दिवाने,

पर पेड़ समझे कि वे उसके अहम के दृश्य से थे चहकते,

अपने झूठे वहम में, मूर्ख पेड़ वो बादलों को ललकारे,

बेखबर, की थी वो बघिया ही, जो उसे बचा के रखे ...

4.

क्यूंकि जब बादल निकलें वृक्ष के अहम को तोड़ने, 

बघिया फूलों को आघोष में लिए, हाथ जोड़ तूफानों को रोके, 

श्रृष्टि  के कहर को झेल, अपनों के जीवन सीचें, 

बेखबर पुष्प और पेड़, बस खेलते रहे खेल दुनिया के ...

5.

पर पता नहीं कब और कैसे,

उस पेड़ में और भी भारी राक्षस आ बसे,

जो बघिया को कोसें और मारें,

डरावने रूपों से फूलों की रूह झक्झोंकें ...

6.

राक्षसों का सिलसिला था चलता रहा,

बघिया के प्रेम से मेहेकता था फूलों का समा,

कई साल बघिया ने राक्षसों से सबको बचा के रखा,

जब हुआ बहुत तो बेचारी ने बिमारी को कबूला ...

7.

आज बघिया के पत्ते हैं झड गए,

और अर्ध-ज्ञान के अहम से फूले वृक्ष को छोड़ गए,

 उनकी ममता की खुशबू से आज भी फूलों का जीवन महके,

याद में उनकी, फूलों के आँसू सूखे ...

8.

अब, फूल देखें पेड़ को बिन बघिया के घेराव के,

डरे, सोचें, बिन सोचे वो डरे ,

न चाहते हुए भी नफरत करें,

उस वृक्ष में उन्हें वोह खौफनाक राक्षस जो दिखें ...

9.

राक्षस अहम का -

हंसने में असहज, आक्रोश में नहीं,

जिसने अपनों से प्रेम के दो बोल कभी बोले नहीं,

जिसमें खुद से पहले, दूसरों को रखने की क्षमता नहीं ...

10.

राक्षस अज्ञानता का -

जो पूर्ण हो पैसे से, प्रेम से नहीं,

जो तौले रुतबे को, देखे भाव को नहीं,

जो है भरा सा, ज़रा भी खाली नहीं ...

11.

पर आज, उन राक्षसों से आजाद,

अपनी खुशबू से भी सिखा रही अपने फूलों को उनकी बघिया माँ,

दिखा रही राक्षस के पीछे का बेबस पौधा,

डर है जिसे अपने कमजोर होने का ...

12.

माँ, आपने अपनी छाया से इस फूल को न होने दिया जुदा,

एक सुन्दर परिवार चुन जो नियति के हवाले था कर दिया,

आज ध्यान में आपके साथ होने का एहसास फिर वापस आ गया,

पर उस मूर्ख पेड़ को अपना पाने का इम्तिहाँ ये क्यूँ दे दिया? 




Saturday, April 20, 2024

प्रतिबिंब

बेटा,
क्या चुकाने की बात तू है कर रहा?
मेरा प्यार था वो, मेरे अपनों के लिए,
कोई क़र्ज़ नहीं, जिससे पा सके तू छुटकारा। 
 
किस समय की तू है गिनती कर रहा?
ये साथ था जो, लगे कुछ सालों का ये,
पर था, आदि से अनंत तक का।

मुझसे जन्मा, है मुझ में ही तुझे मिटना,
जब ख़ुद ही माना तूने देवी मुझे,
तो यह कैसे हिसाब में तू लग गया?

बेटा,
नहीं कुछ गया है, है नहीं तू अकेला,
ल तू अब मेरे दिये पथ पे,
बिन डर, झिझक के, बहुत दूर अभी है चलना।
 
हर स्वास जीवन है, इसे ख़ुशी से है जीना,
मैं आयी इस अंधेरे में लौ जलाने,
अब इस दिये को तुझे है अखंड बनाना।
 
बहुत हुआ, छोड़ ये सवाल बेमतलब के,
चाहे मिलना मुझसे 
तो बस आँख भर बंद कर ले।
 
और बेटा,
कहीं और नहीं, तुझ ही में है प्रतिबिंब मेरा।।

Saturday, March 9, 2024

काश


काश मैं काम से एक दिन चुरा,

आपको सप्राइज़ कर,

आपके भरवा टमाटर और पराँठे खा पाता ।।।


काश, मैं बचपन से अब तक,

थोड़ा और अच्छे से आपको गले लगा पाता,

काश, मैं आपके जिंदगी भर के कष्ट को,

खुद में समा पाता।  

 

काश,

     मैं आपके साथ थोड़ा और समय बिता पाता ।

 

काश, मैं एक बार फिर,

आपके माथे को चूम पाता,

रख कर अपना हाथ आपके सर पर,

काश आपके प्यार का कुछ अंश चुका पाता ।।।

 

काश आप होती यहाँ मुझे बताने कि आगे क्या करना है,

काश मैं कितना अकेला महसूस कर रहा हूँ,

यह आपको बता पाता।

 

काश,

    मैं आपके साथ थोड़ा और समय बिता पाता ।

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