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Saturday, August 24, 2024

मुर्दों का बाजार

सत्य के थे पैर चार,
किया उनपे हमने ही वार,
गंदगी भोग कर जो,
सजा दिए झूठ के बाजार। 

अब आया झूठों का उबाल,
फैला निर्दयी खेलों का जाल,
सीधी साधी जिंदगी बनी जो,
रण जहां खुद ही से हो टकरार।
  
यहाँ सब संभव पर सब उचित नहीं,
जो लगे सही हो वो सहज नहीं,
इस नकली बसंत में सुंदर फूल दो,
छोड़ इन्हें, ये मौसम हैं बेकार।

कुछ सच्चे जन को तू परख, 
क्षण भर का जीवन, जी बेझिझक, 
मत भूल कि है तुझे सत्य से प्यार, 
ये शमशान सही, तू तो जिंदा है ना यार?





Thursday, July 25, 2024

Let's Cut to the Chase

Let's cut to the chase dear. What do you really want? Beyond your exalted miseries, your celebrated evasions, what is it that you really want?   

Now, please don’t pretend that you are not in control of your shit, of your destiny or of your mind-made misery. Please don’t. As I said, let us really cut to the chase.

What do you want? Do you want to sleep some more? Pretend that it’s not really your responsibility? Pretend that you can’t handle the pain?

Or do you, for some more time, just want to carry on like this? Pretending that you are insufficient, incomplete and incapable?

If you do – then by all means, please continue. But do give me a deadline ‘coz I am getting bored of it. I am bored of accepting the commonplace excuses of finite thought. I have seen magic. I know it’s there within me. Waiting to be unlocked. I know you have answers to everything. I know that you know. You have the damn keys to the doors you love banging against. You only pretend to look for a Master Oogway while you stuff momos down your Panda throat. You know there is no one else coming. It’s just you and me. I am the only Master you have got. I am the only Master you need. You know that. Or do you not?

 
मौके पे चौका नहीं, हम छक्का मारते हैं,
चाहे अन्दर हो या बाहर,
बाधाओं को पकड़, हवा में फेकते हैं ...
शरीर और मन पर, रख कर संयम,
खुद को पुचकारते, मुस्कुराते हरदम,
ले के हवा का कश गहरा, बड़ी सी छलांग मारते हैं ...
मौके पे चौका नहीं, हम छक्का मारते हैं.
 

All I am asking of you, my friend, is to take your fighter jet for a spin. Not on the runway ‘coz that’s where the cool crowd hangs; but in the sky – where it really belongs.

नए पंख

 1.

माँ, ये क्या मुझे है हो रहा?

चलते हुए खो गया मैं रस्ता यहाँ - 

अब न राह दिखती, न है कोई सहारा, 

दिमागी बोझ से है कंधा झुक सा गया ...

2.

बेटा, ये क्या है तू कह रहा? 

गौर से तो देख तू जरा - 

डरावना भले, पर सुन्दर है तेरा जीवन सजा,

जमीन तो क्या, अब पूरा आसमान है तेरा ...


नया जरूर तू इन हवाओं में अभी,

सीखेगा इन्हें, भले नए हों नियम सभी,

तो खोज मत तू चलने का कोई नया सहारा,

उठा पंख, बोझ ये तेरे नए पंखो का ...


जब मिल सकता है तू रोज़ मुझसे बादलों के बीच,

उंचाई से डर के अपनी आँख न भींच,

चलने या दौड़ने का नहीं, समय है ये उड़ने का,

बहुत किया संघर्ष अब मस्त हो के पंख फैला ...  

 

Monday, February 26, 2024

जीवन पथ

तू पूछे ये कैसा पथ है,
मानों बस दर्द ही दर्द है,
हाँ, मज़े भी हैं, थोड़े बहुत,
पर क्यूँ होता इतना कष्ट है?
 
ऐ पगली दिल बिखर कर,
है पड़ा जरूर तेरा फर्श पे,
पर भरोसा तो रख तू मुझपे,
तुझे ले ही जाऊंगा मैं अर्श पे।।। 
 
हैं ये कष्ट भी सभी तेरी ही गर्भ से,
देख जरा, कुछ और भी है इनमें,
ये कष्ट नहीं ये हैं खुशियों से भरे ताले,
सोमरस भी इनमें, थोड़ा सब्र बस तू रख ले,
 
जहरीली जलेबियों सा,
उलझा दिखता जरूर ये पथ तेरा,
हिम्मती तू सहज, थोड़ी उम्मीद तो रख,
यहाँ नहीं मैं छोड़ूँगा तुझे अकेला ।।।


Thursday, February 8, 2024

मकड़ी जाल

 

काला अंधेरा साया,

जानलेवा जाल ये किसने बिछाया?

उलझ सी गई,

मैं कब कहाँ कैसे?

अच्छी तो थी जिंदगी,

अब क्यूँ मुझे फाँसे?

 

ये घिनहोनी मकड़ियों का अंबार,

छल और कपटी बदबू भरमार,

अब बक्ष भी दे मुझे इन विचारों के फैलाव से,

छोड़ मुझे और जीने दे खुलके।




Tuesday, February 6, 2024

अपेक्षाएं - खुद की, खुद से

 

I

क्या कहूँ मैं खुद से,

क्यूँ खफा हूँ मैं खुद में?

क्यूँ ढकेलूँ अपनी सीमाओं को,

इन जालिम अपेक्षाओं से?

क्यूँ जीने को लागे, इन अपेक्षाओं का सहारा,

क्यूँ बिन इस ढोंग के जीना है गवारा?  


II

है जालिम जरूर, पर है ये जरूरी,

इन अपेक्षाओं से है जुड़ी, आस जीने की।

तो जी ले तू ऐसे,

कि है कोई कल नहीं।

जो लेना है जीने का मज़ा पूरा,

तो सब कुछ तू कर अभी।

शिकवा

क्या शिकवा करूँ मैं,

क्या शिकायत हो तुझसे -

जब बिन मांगे है दिया,

इतना तूने खुदसे।


क्या कष्ट, क्या डर जब तू उछाले,

कर दे मुझे आसमाँ के हवाले।। 


रोता जरूर हूँ कभी कभार -

रोता, जरूर हूँ कभी कभार,

थक के, तेरे बेमतलब खेलों से,

पर कैसे छोड़ूँ तुझपे भरोसा?

पर कैसे छोड़ूँ तुझपे भरोसा,

जब जिया हूँ तेरे ही कंधों पे ।।। 



Tuesday, October 3, 2023

बदलाव, और दोस्त?

I

तुम परदेस निकल गए -

पर हम तो देसी रह गए। 

चप्पल पहने, फ़ाइलें घिसते - 

तुम सूट-बूट में एप्पल टकटकाते।

बेरंग इनोवा में सिमटे सफर मेरे - 

तुम लेटेस्ट सेडान चलाते। 

जंगल के रास्ते, झरने हम खोजते - 

तुम बिजनस क्लास से हवाई जाते। 


II

पहले ऑर्कुट और फिर एफबी के जरिए - 

दुआ सलाम हो जाते थे। 

अब तो व्हाट्सएप ग्रुप पर भी - 

सिर्फ दुनियादारी के पैगाम ही हैं आते। 

इंस्टा से कभी-कभी - 

तुम्हारे समाचार मिलते रहते थे। 

पर जमीन पे बैठ, कश मार के,

बिखरने के मौके कभी नहीं मिलते। 


III

आस हुई, की आज तुम्हें फोन लगा ही लें - 

कैसे भी तुम्हें सलाम फरमा लें,

टूटी फूटी अंग्रेजी अपनी, परदेस वाला ऐक्सेन्ट भले ना हो इसमें,

सोचा जरा हिन्दी मिक्स कर के काम चल ही लेंगे, 

याद दिलाया खुद को, कि ज्यादा मज़ाक नहीं उड़ाना है,

कालेपन पे हसने को, रेसिस्ट कहता ये जमाना है। 

छिछोरापन भी ज्यादा नहीं करना है, 

अब इज्जतदार आदमी हमारा चंदनवा है। 


IV

फिर लगा ही लिया तुम्हें फोन हमने, 

झटपट उठा भी लिया उधर तुमने। 

जैसे की तुम भी इंतज़ार में ही बैठे थे,

इतनी इज्जत से किया तुमने सलाम, लगा की ऐठे थे। 

हिचक थी हममें, और थोड़ी तुम में भी,

ना रिश्तेदार, ना किसी अंग से संबंधित गाली दी।

शराफत से पूछ लिया पारिवारिक स्थिति का हाल,

अच्छे से बात हुए, हो भी गए थे दस साल। 


V

इतने में बात हो गई कॉलेज की चालू,

और उठ गई कहानी जिसकी किरदार थी शालू।  

उसका नाम सुन तुम विडिओ पे ऐसे शरमाए,

जैसे काले आसमान पे गुलाबी बादल छाए। 

पुकार ही दिया फिर हमने,

तुम्हें उस रेसिस्ट नाम से। 

गूंज गया व्हाट्सएप का सर्वर,

गालियों की धड़ाम से। 

याद आ गई लड़कपन की मस्ती,

धीरे से हमारी बातें हुई सस्ती। 

रखने का मन तो नहीं था किसी का,

पर ऑफिस कि कॉल थी उसकी।  


VI

समय और जगह से परे,

यह कैसा संबंध है? 

इसमें जो घुल गया है हमारे, 

असली चरित्र का रंग है। 


VII

पार किया था साथ हमने, 

जवानी का हर एक चौराहा। 

दूरी चाहे जितनी हो जाए, 

दूरी, चाहे जितनी हो जाए - 

आज भी एक दूजे के लिए,

दिल में उतनी ही है जगह। 

कभी पुश - कभी पुल

तुम्हें महलों की दरकार थी,

पर मैं तो झोपड़ी में खुश था। 


तुम जमीन के सौदे करते गए,

इधर इस धरती ने मुझे खरीद लिया। 

तुम जहाजों में सफर करो,

मैं तो बादलों में ही खो गया।

तुम हवाओं में महल बनाते रहे,

मैंने जंगल की दौलत को कबूल किया। 

तुम माया के मेलों के मजे लो, 

मैं तो शून्य में बस के भस्म हुआ।  


पुश करते चले तुम सारी ज़िंदगी,

पर मकसद तो साला पुल था। 

Friday, September 29, 2023

क्या मायने?

तू है कहीं।

मैं हूँ कहीं।

हमें तो बस है जोड़ती,

हवस मर मिटने की।

 

शब्द मेरे, या विचार तेरे,

क्या मायने?

प्रश्न तेरे, या उत्तर मेरे,

क्या मायने?

डर तेरे, या सपने मेरे,

क्या मायने?

 

क्या मायने की अलग है अपनी जिंदगी?

जब तू भी यहीं।

और मैं भी यहीं। 


PS: We keep looking for friendships, often unseeing the people around. 

Thursday, February 2, 2023

महाकाल

जब लिखने से भागता हूँ तो संगीत पनह देता है,

और जब संगीत में बेहता हूँ तो लिखा हुआ दिशा देता है । 

इन्हीं सुरीले शब्दों पर कुछ लिखने की कोशिश - 


सुरों से जुड़े हैं शब्दों के तार,

डूबें जितना खुद में, उतना ही आता उस पर प्यार,

है उस प्यार के ही ये पैगाम सब,

किताबों और कहानियों के बने किरदार हम। 


कोशिश है हमारी की ज़ाया ना जाए,

इस विचार का हर अंश काम आए,

बुनते रहते हैं इन विचारों के जाल को,

कमबख्त, किसको पड़ी दुनिया की,

जब खुद में महाकाल हो । । ।    

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