Friday, November 25, 2022

किशमिश

समय के थपेड़ों में उलझी,

तन पे सजाए, निशान ये, सितम के - 

इस विशाल दुनिया में हो तुम छोटी सी,

अपनी भोली सी, थकान भरी, मुस्कान लिए - 

सूखे से कवच में खुद को लपेटी,

अंदर बैठी हो गुपचुप, मन में, मिठास भरे - 

रिश्तों के पकवान में हो समा जाती,

हर सलवट में, सहज, प्रेम भरे। 


अदबुद्ध हो, अदबुद्ध हो तुम सचमुच, मेरी किशमिश । ।     

तर्क का गहना

इस दिल की बनावट है हीरे सी, 

हर चेहरे में दिखता इसके - जीवन बहुरंगी । 

माला-सी ये नन्ही कविता मेरी,

इन भावनात्मक रंगों को - अपने शब्दों से पिरोती । 


पहनाती उनपे मेरे तर्क का गहना, 

और संगवारी से कर देती है बयां । 


यह कविताएं ही तो हैं - 

ये ही तो दे देती है - इस दिल को पनाह।  

जाने कब मैं इन शब्दों को पिरोने के काबिल बना !

जरा सोचो - यह काबिलियत ही तो है इंसान होना ।। 

कल से फिर

1.

कल फिर से,

इस दिन में,

सूरज ढलेगा।


कल फिर से,

इस घर में,

रोशनी बुझेगी।


कल फिर से,

इस दिल में सवाल उठेगा, 

फिर झूठी फ़िराक जगेगी।।


2. 

कल से फिर,

इस कमरे में,

एक फूल खिलेगा।


कल से फिर,

इस धरती पे, 

वो सूरज उगेगा।


कल से फिर,

ज़हन में चिराग जलेगा।  

और फिर, समर्पण की आग लगेगी ।।


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